पत्र अब व्यथित खड़े हैं,
कहीं, तलाशते हैं अपने अस्तित्व को
कि “आन-लाईन प्रथा के निर्वहन में,
उसे विश्व भुला बैठा है….लिफाफे,
अन्तर्देशीय, नन्हें पोस्टकार्ड
उपेक्षा का दंश झेलते
सहमे से, कोने में दुबके, मातम सा मनाते…
सोशल मीडिया ‘ट्वीटर, ब्लॉग-व्हाट्स एप,
मैसेज, इन्स्टाग्राम फेसबुक, यू-ट्यूब की तूफानी हवाओं,
और उन पर जुटे लोगों की भीड़ में
अपनी ध्वस्थ होती साख
और अभिव्यक्ति को अंतिम सांसे लेते देख रहे हैं
उन्हें याद हैं वे सुनहरे दिन
जब उनकी पृष्ठभूमि पर लोग केरते थे
अपनी-कोमल प्रेम अभिव्यक्ति,
शोक में डूबे संदेश… !
पिता-माता के चरण स्पर्श करते बैटे के मार्मिक शब्द
संसार ‘विरह-व्यथा’ की प्रेम-पगी पंक्तियों के सजते बाजार…
कुछ आंसू भरे, कुछ प्रणय के मीठे संबोधन….
बहन की राखी अपनी गोद में दबाये पहुँचते थे भाई की कलाई तक!
सब कुछ सिमट गया है ‘ऐप’ के जंजाल में
और आत्मिक रिश्ते सिसक रहे हैं अकेले अकेले से!
– राजेश शर्मा वडोदरा (गुजरात)

