Category: साहित्य Literature

  • कविता: सुरमई क्षितिज पर

    कविता: सुरमई क्षितिज पर

    निराशा को परास्त कर और…
    संत्रासों से परे, एक गुलाबी ‘आशा’
    ऊंची उड़ान के पर फैलाए-
    रक्ताभ क्षितिज पर साम्राज्य –
    और विषमताओं को ध्वस्त करती,
    एक !


    अनूठी सुरमयी, संगीत की थाप पर-
    मनोहारी नृत्य करती, विराजमान होती है….!
    सांझ प्रहर पर-
    मानो, गुलाबी चांदनी प्रज्जवलित होकर,
    संभावनाओं, आमोद-प्रमोद के-
    असंख्यों कोंपल फूटती कलियों
    और फूलों के महासागर में-
    दिलकश गीतों-तरानों को स्वर देती,
    नन्हीं-नन्हीं उड़ती तितलियों की उड़ान-
    और गुंजायमान, गुनगुनाते भंवरों सी


    नन्हीं बालिका और कोयल की कुहूक लिये
    क्षितिज पर, पूर्ण चंद्रमा की चांदनी सी-
    कई निराशाओं को पराजित करती,
    एक भोली सी आशा…
    सुगंधो की साम्राज्ञी सी-
    समेट लेती है अपने आगोश में…!
    जहाँ केवल स्वर्ग है, पुनीत पर्व है,
    सुरमई क्षितिज पर….!!

    राजेश शर्मा 
    बड़ोदेश गुज

  • माँ कौन है? मातृ देवो भवः

    माँ कौन है? मातृ देवो भवः

    माँ सृजन करती है इसलिए वह ब्रह्माणी है। माँ पालन करती है इसलिए वह वैष्णवी है और अपने बच्चों में संस्कारों को सृजित कर दुर्गुणों का नाश करती है इसलिए माँ ही रुद्राणी है। माँ का प्यार दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ प्यार है, माँ का त्याग दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ त्याग है।

    माँ का बलिदान दुनियाँ का सर्वश्रेष्ठ बलिदान है, माँ की सीख दुनियाँ की सर्वश्रेष्ठ सीख है और माँ की गोद दुनियाँ का सबसे सुरक्षित और शीतल स्थान है।कभी मंदिर ना जा सको तो कोई बात नहीं बस माँ के चरणों में बैठ जाया करना और कभी माथे पर चंदन ना लगा सको तो कोई बात नहीं बस माँ के चरणों की पवित्र रज माथे पर लगा लेना इससे बढ़कर कोई दूसरा सौभाग्य नहीं हो सकता है।

    सारे तीर्थ करने के बावजूद भी यदि सबसे बड़े तीर्थ माँ-बाप की सेवा से वंचित रह गये तो फिर समझ लेना कि सब व्यर्थ ही गया है।

    करुणा, प्रेम और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति सर्वदेव और सर्ववेद वंदिता माँ के श्री चरणों को समर्पित मातृ दिवस की आप सभी को अनगिन शुभकामनाएं। – विनोद ओझा, भीलवाड़ा

  • मातृ दिवस विशेष, कविता: मुझे तुम्हारी याद आती है!

    मातृ दिवस विशेष, कविता: मुझे तुम्हारी याद आती है!

    कस्तूरी की गंध सी मां

    माटी की सुगंध सी मां

    सब देवों की पसंद सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    अंधियारे में दीप सी मां

    भरे मोतियों सीप सी मां

    हर पल मेरे समीप सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    मन में आशा बोती सी मां

    खुशियां रोज पिरोती सी मां

    कभी नाओझल होती सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    कोयल की पहली कूक सी मां

    दिल में उठती हूक सी मां

    कभी न करती चूक सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    भरे पोष में धूप सी मां

    सदैव लगती रूपसी मां

    तपते मरू में कूप सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    सब ग्रंथों में वेद सी मां

    कड़े परिश्रम स्वेद सी मां

    सब रंग समेटे श्वेत सी मां

    मुझे तुम्हारी याद आती है!

    अंतराष्ट्रीय मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

    : डा. सुलोचना शर्मा, बूंदी

  • कविता: पत्रों की व्यथा

    कविता: पत्रों की व्यथा

    पत्र अब व्यथित खड़े हैं,

    कहीं, तलाशते हैं अपने अस्तित्व को

    कि “आन-लाईन प्रथा के निर्वहन में,

    उसे विश्व भुला बैठा है….लिफाफे,

    अन्तर्देशीय, नन्हें पोस्टकार्ड

    उपेक्षा का दंश झेलते

    सहमे से, कोने में दुबके, मातम सा मनाते…

    सोशल मीडिया ‘ट्वीटर, ब्लॉग-व्हाट्स एप,

    मैसेज, इन्स्टाग्राम फेसबुक, यू-ट्यूब की तूफानी हवाओं,

    और उन पर जुटे लोगों की भीड़ में

    अपनी ध्वस्थ होती साख

    और अभिव्यक्ति को अंतिम सांसे लेते देख रहे हैं

    उन्हें याद हैं वे सुनहरे दिन

    जब उनकी पृष्ठभूमि पर लोग केरते थे

    अपनी-कोमल प्रेम अभिव्यक्ति,

    शोक में डूबे संदेश… !

    पिता-माता के चरण स्पर्श करते बैटे के मार्मिक शब्द

    संसार ‘विरह-व्यथा’ की प्रेम-पगी पंक्तियों के सजते बाजार…

    कुछ आंसू भरे, कुछ प्रणय के मीठे संबोधन….

    बहन की राखी अपनी गोद में दबाये पहुँचते थे भाई की कलाई तक!

    सब कुछ सिमट गया है ‘ऐप’ के जंजाल में

    और आत्मिक रिश्ते सिसक रहे हैं अकेले अकेले से!

    – राजेश शर्मा वडोदरा (गुजरात)