पूजा कहती है की लड़कियों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना चाहिए। वो मात्र 26 साल की है और हजारों लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं। वो मृतक की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन्हें सम्मानजनक विदाई देने का काम कर रही हैं। पूजा ने मां और भाई की मौत के बाद इस काम का बेड़ा उठाया। उनकी ये कहानी हर किसी के प्रेरक है।
पूजा ने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार करने का बेड़ा तब उठाया जब उन्हें अपने परिवार के बगैर ही भाई का अंतिम संस्कार करना पड़ा था। 2022 से अब तक पूजा 4 हजार से ज्यादा लावारिस शवों को सम्मान से अंतिम विदाई दे चुकी हैं। पूजा का ये सफर उसके इकलौते भाई की उसकी आंखों के सामने गोलीमार कर की गई हत्या से शुरू हुआ। पूजा की मां का बीमारी के कारण निधन हो गया। इस दुख से परिवार उबर भी नहीं पाया तब तक एक विवाद में हुए झगड़े में उनके भाई की मौत हो गई। पूजा के पिता कोना में थे, ऐसे में परिवार में कोई पुरुष नहीं था, जो उनके भाई का अंतिम संस्कार करता। परिवार के ऐसे हालात में पूजा ने हिम्मत नहीं हारी और पगड़ी पहनकर खुद ही अपने भाई का अंतिम संस्कार किया।
इस पूरे घटनाक्रम से उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि जिन लोगों के परिवार में कोई नहीं है उनका अंतिम संस्कार कैसे होता होगा। इसके बाद पूजा ने न जाति देखी न धर्म और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने का बेड़ा उठा लिया। वो पिछले दो सालों में लगभग 4000 हजार लाशों को सम्मानजनक विदाई दे चुकी हैं। वो इस बात का भी ख्याल रखती हैं कि मृतक की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ही उसका अंतिम संस्कार किया जाए। पूजा दो साल से ये काम बिना किसी स्वार्थ के कर रही हैं।
उनके इस काम पर किसी का ध्यान नहीं गया। लेकिन पिछले साल, एक अज्ञात मृतक व्यक्ति के परिवार ने उनसे संपर्क किया और उनके बेटे के अंतिम संस्कार करने के लिए आभार जताया। इस बात से पूजा को एहसास हुआ कि उनकी ये पहल लोगों के जीवन में बदलाव ला रही है।इस सेवा कार्य के चलते उनकी सगाई टूट गई और उनके होने वाले पति ने शादी या सेवा में से जब एक को चुनने की शर्त रखी तो पूजा ने सेवा को चुना। पूजा की ये कहानी धर्म के नाम पर ढकोसला करने वालों, जाति के नाम पर नफरत करने वालों और महिलाओं को कमजोर समझने वालों के लिए एक सबक है।
पूजा शर्मा का कहना है कि लड़कियों को सिर्फ शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी मजबूत होने की जरूरत है तभी उनकी समस्याओं का अंत होगा।अपने मिशन को पूजा करने के लिए पूजा अस्पतालों के मुर्दाघरों के संपर्क में रहती हैं, जहां से उन्हें लावारिस लाशों के बारे में जानकारी मिलती रहती है। इसके बाद वो शव को निकटतम श्मशान घाट तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था करती हैं। एक एंबुलेंस को किराए पर लेने और अंतिम संस्कार करने करीब 2 हजार रुपये का खर्चा आता है।
पूजा पढ़ी लिखी हैं। उनके पास सोशल वर्क में मास्टर डिग्री है। उन्होंने अपने मिशन को पूरी तरह समय देने के लिए HIV काउंसलर की नौकरी छोड़ दी। पूजा अपने मिशन को परिवार की मदद से पूरा करती हैं। उनकी दादी अपनी पेंशन का पैसा उन्हें देती हैं और उनके पिता जो ड्राइविंग का काम करते हैं, वह भी मदद के लिए पैसे देते हैं। इसके अलावा पूजा को समाजिक कार्यों से जुड़े कुछ लोगों ने भी आर्थिक मदद की है, जो उनके काम से प्रेरित हुए हैं।
लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के इस काम के अलावा पूजा ने ‘ब्राइट द सोल फाउंडेशन’ नाम के एनजीओ को शुरू किया है। इस एनजीओ के जरिए वो लोगों को प्रेरित और सशक्त बनाना चाहती हैं। पूजा का एनजीओ और उनका निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करने का महान मिशन दुनिया के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है।


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